व्यंग्य--(महंगाई दो प्याजा)
आखिर प्याज की इस लगातार बढ़ रही महंगाई ने मुझे प्याज पे व्यंग्य- 'महंगाई दो प्याजा' लिखने को बाध्य ही कर दिया. सच तो यह है कि, अभी तलक बरसात में नदियाँ ही खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी, लेकिन इस समय - 'प्याज की महंगाई भी अपने खतरे के निशान से भी ऊपर है.' पत्नी का शेयर बाजार की तरह गिरे हुए मुँह को देखकर तरस आ रहा, पर क्या करूँ? मैं भी अपने जेब की संवैधानिक व्यवस्था से मजबूर हूँ. 'आज किचन की ये श्रृंगारिक हालत है कि वहा पिछले चार दिन से रखा प्याज नकचढ़ी साली की तरह टोकरी में ऐठ रही है.'
प्याज ने मुझ व्यंग्य लेखक को भी कंफ्यूजा अवस्था में पहुंचा दिया है. समझ नहीं पा रहा कि मैं प्याज को स्त्रीलिंग लिखूँ या पुलिंग. कभी ये प्याज - 'पत्नी की तरह बे-कीमत थी, आज प्रेमिका के हाव-भाव से भी महंगी लग रही.' प्याज के चलते इस समय सब्जी मंडी भी.वल्लाह गज़ब है. जो ठेले वाला अपने ठेले पे केवल और केवल प्याज बेच रहा उसका मिजाज जैसे कि-- 'किसी थाने के कोतवाल सा है.' ग्राहक प्याज का भाव भी पुछने के लिए गर ठेले से प्याज उठा रहा तो डरते-डरते. ये डर -- 'ठेले पर प्याज बेच रहे थानेदार रूपी दुकानदार से है.' कि कहीं वे चोर-उचक्के की तरह डाट न दे.
पहले जो सब्जी मैं 20मिनट में खरीद कर खाली हो जाता था अब वही सब्जी खरीदने में मुझे घंटों लग जाते है. ये सारी महिमा प्याज के बढ़े हुऐ भाव या महंगाई के वजह से है. सब्जी खरीदने की ये ओलंपिक शुरुआत सब्जी मंडी के पहले ठेले से शुरू हो कर आखिरी ठेले पर जाकर खत्म होती है.
पहले सब्जी लेने जाता था तो, पत्नी यूँ ही झोले को पकड़ा देती थी और साथ ही दो- एक कड़ी बातें भी फ्री मे कह देती थी. लेकिन इस प्याज के बढ़े हुए दाम या महंगाई ने उसका बॉडी
लैंग्वेज ही बदल दिया है. वे तीन-चार दिन से झोले को बहुत प्यार से पकड़ा रही और मेरे सब्जी लेके लौटने का इंतजार भी अब ऐसे कर रही जैसे वे तब किया करती थी, जब उसकी और मेरी शादी हुई थी. ये सब प्याज की वजह से हुआ है. वे गेट पर खड़ी रहती है और बड़़े उत्साह के साथ झोले को पकड़ती है. लेकिन जैसे ही मैं उसे प्याज न खरीदने की बात कहता हूँ, उसका सारा उत्साह काफूर हो जाता है. और उसके -- 'किचन की तरफ बढ़ते पांव मन- मन भर के हो जाते है.'
अब तो मुझे और व्यंग्य लेख दोनो को ही --'इस प्याज के बढ़े दाम का खतरे के निशान के नीचे आने का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार है.' क्योंकि प्याज की महंगाई की वजह से अपनी पत्नी का लटका हुआ मुँह मुझे अब बहुत कष्ट दे रहा. काश! सरकार जल्दी प्याज के दाम या महंगाई को कंट्रोल करें. जिससे मेरी पत्नी के खूबसूरत से मुँह का लालित्य वापस लौटे और हम भी इस 'महंगाई दो प्याजा' से बरी हो.
यह लेख मेरी स्व-लिखित व अप्रकाशित है.
लेखक- रंगनाथ द्विवेदी
जजकालोनी मियांंपुर
जौनपुर 222002(U.P.)
Mo.no.--7800824758
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