चील-चिलाती धूप में
आकर्षित करती है,
मेरी कविता को----
उस मजदूरन की सुंदरता.
जो अपने दूधमुहें बच्चे को,
बगल में छाया कर लिटा,
पसीने से तर-बतर भीगी
चलाये जाती है,
छोटा सा फावड़ा
उस बच्चे का---
बीच-बीच में रोकर,
अपनी मजदूरन माँ को बुलाना,
और उस मजदूरन माँ का,
विह्वल हो--
अपने दूधमुहें बच्चे को ,
स्तनपान कराना,
और फिर उसे लिटा----
पहले की तरह
चील-चिलाती धूप में,
फिर से फावड़े को चलाना,
और पसीने से तर-बतर भीग जाना,
सच कितनी आकर्षित करती है,
मेरी कविता को------
तब उस मजदूरन की सुंदरता.
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758
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