Thursday, 16 April 2020

लघुकथा---(चुरन वाले काका )

लघुकथा----(चुरन वाले काका )

 आज निर्मला अपने मायके कई सालों के बाद आई थी, वे घर के सारे सदस्यों से काफी रात तलक बाते करती रही. जिसकी वजह से उसकी नींद सुबह काफी देर से खुली. नींद खुलने के बाद निर्मला अपनी दिनचर्या के सारे काम निपटा कर अपनी उन सहेलियों से मिलने चल पड़ी जो बचपन में उसके साथ खेली व पढ़ी थी. निर्मला अपनी सभी सहेलियों से मिलने के बाद जब अंत में पुष्पा से मिलकर अपने घर लौट रही थी तो उसे--अपने स्कूल का वे गेट दिखा, स्कूल का गेट दिखते ही निर्मला के मुंह में वह बचपन का चटखारा और पानी भर आया जो उसे चूरन वाले काका को देखकर आता था. 

 उन दिनों निर्मला को सबसे ज्यादा पसंद वे चूरन और चूरन वाले काका ही थे. हालांकि निर्मला चूरन वाले काका नाम नहीं जानती थी इसलिए निर्मला उनको चूरन वाले का काका कहकर बुलाती थी.निर्मला के वे चूरन वाले काका कभी कभार पैसे ना रहने पर भी उसे चुरन  दे दिया करते थे. निर्मला जैसे अपने बचपन के चुरन वाले  काका को अगल-बगल कहीं देख या ढूंढ रही हो,  लेकिन उसके वे चूरन वाले काका कहीं दिखे नहीं उनके बारे में जानने की उत्कंठा निर्मला के मन में इतनी उठी कि वे अगल-बगल के लोगों से उस चूरन वाले काका के बारे में खुद को पूछने से नहीं रोक पाई.

 अगल-बगल के जानकारों से पता चला कि निर्मला के चूरन वाले काका को मरे  लगभग 2 वर्ष बीत चुका था. इतना सुनकर के निर्मला के मुंह में वह बचपन का चटखारा और पानी नहीं आया जो उनके चुरन के नाम पर अक्सर उसके मुंह में आ जाया करता था, हां इतना अवश्य हुआ कि वे पानी निर्मला की आंखों में भर आया. बचपन की निर्मला का अपने चुरन वाले काका के प्रति वे इतने भावुक आंसू थे जैसे किसी बिटिया ने अपनी बापू को याद किया हो. फिर न जाने क्यों निर्मला को ऐसा लगा कि जैसे तीन-चार पुड़िया चुरन की बांधे चूरन वाले काका कह रहे हो कि बिटिया तुम हमेशा खुश रहो. 


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 

लेखक--रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

No comments:

Post a Comment