Monday, 13 April 2020

लेख---(फिर जीवित हुई 'कर्मनाशा की हार ')

 ( फिर जीवित हुई 'कर्मनाशा की हार')

इस समय लगभग पूरे देश व राज्य में बाढ़ से हाहाकार की स्थिति है. क्या पशु,क्या पक्षी, क्या मनुष्य सभी इसकी जद मे है. खाली ज़मीन तक दिखने के लाले है. इस भीषण जल प्लावन से.उसपे तुर्रा ये है कि-"विसंगतियां अट्टहास कर रही". ऐसी ही बाढ़ की विभीषिका पे हमने छात्र जीवन में एक जिवंत सी कहानी "कर्मनाशा की हार" पढ़ी थी.वैसे लेखक की उस बाढ़ पे लिखी कहानी जैसी कहानी मैंने फिर किसी लेखक मे न पायी और न पढ़ी.हाँँ इतना जरुर है, कि मैने सोचा न था कि आधुनिक व्यवस्था के इस दौर में वे कहानी "कर्मनाशा की हार" फिर से जीवित हो जायेंगी.

लेकिन कहानी "कर्मनाशा की हार" फिर जीवित हुई लेकिन कहानी से भयावह,हाँँ फर्क इतना जरुर है, कि इस बार ये "कर्मनाशा की बाढ़" केवल बिहार की बाढ़ नही अपितू लगभग-लगभग पूरे देश की बाढ़ है". वे तथाकथित राज्य चाहे चकाचौंध व अर्थ की राजधानी मुंबई या महाराष्ट्र हो,मध्यप्रदेश हो,उड़ीसा हो,गुजरात हो. वर्तमान में ये विभीषिका बिहार मे है ,उस बिहार में है जिस बिहार की एक नदी कर्मनाशा की बाढ़ पे लेखक ने अपनी कहानी "कर्मनाशा की हार" लिखी थी.वर्तमान मे बिहार में सुशासन बाबू की सरकार है,यहा सुशासन बाबू से अभिप्राय नीतीश बाबू से है.

कभी बिहार की राजधानी पटना को आंचलिक गानो में गायको ने गाया था कि--"पटना से वैद्या बोलाय दा कि नजरा गईनी गोईया".अब इस गाने की मिठास पे इस बाढ़ की भयानक कड़वाहट का असर है.इस बाढ़ की जद मे स्वयं सुशासन बाबू यानि नीतीश कुमार की राजनीति बुरी तरह फस चुकी है.इस आंचलिक गाने की लाईन "नजरा गईनी गोईयां" को अब आप नीतीश की राजनीति से जोड़कर देखे कि किस तरह इस बाढ़ से उनकी राजनीति और कुर्सी दोनो नजरा चुकी है.भाजपा से नाखुश होने के इज़हार से दो चार थे,अब उसी भाजपा के मोदी नाम की गलबहियां से ये अपनी राजनीति की इस "कर्मनाशा की हार " से निकलने व बचने को लालायित दिख रहे.लेकिन इनके राजनीति की "कर्मनाशा की हार" या जीत जनता तय करेंगी जो खुद इस समय बाढ़ से पीड़ित व आहत है.

लेकिन कहानी में "कर्मनाशा की हार" के लिये तमाम,जादु,टोने,टोटके होते है,"कर्मनाशा हारती भी है" लेकिन बहुतो को तबाह व बर्बाद कर.आधुनिक युग,तकनीकी विज्ञान इसे अंधविश्वास मानती है और सही भी है. लेकिन इस विज्ञान और आधुनिकता ने हमें प्रकृति से खेलने और इसे बर्बाद करने का ऐसा खेल सिखा दिया है जो कि उस कहानी से कही ज्यादा भयानक होगा, और पूरी आधुनिक विज्ञान की दुनिया कहीं ऐसा न हो कि वे "कर्मनाशा की हार"  की कहानी के साथ ही अपना सबकुछ खुद हार जाये.आईये हम आप प्रकृति में उस बाढ़ की कहानी "कर्मनाशा की हार" को जीवित होने से बचाये.


यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

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