जब भी मुझे उस पहाड़ी लड़की की याद आती है, मैं--"तमाम उन ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों की वादियों में खो जाता हूं". मुझे याद आने लगते है वे देवदार और सायबान के ढेर सारे दरख़्तों पर बोलते हुए परिंदों के जोड़े और शाम के धुंधलके में कल फिर इन शाखों पर आकर बैठने और अपनी महबूब परिंदे के साथ गुफ्तगू करने के वादे के साथ अपने-अपने घरोंदे की तरफ लौटना कितना संगीतमय था.ऐसी ही-- "हमारी महबूब पहाड़ी लड़की थी. जिसे मैं अब रफ्ता रफ्ता मोहब्बत करने लगा था".
वे भी पहाड़ों के सारे काम निपटा जब अपनी सहेलियों के साथ लौटीती तो उसका अपनी सहेलियों के साथ हंसना बोलना वे पहाड़ों का सबसे खूबसूरत संगीत सा पायलों का छनकना और लौटती भेड़ो के गले की घंटियां का बजना मेरी किसी कविता या ग़ज़ल की अब तलक लिखी सबसे बेहतरीन किताब सी वे एक एक शब्द मेरी दिल की धड़कनों के साथ कब धड़कने लगी इसका पता मुझे भी नहीं चला. और जब चला तो मैंने उस पहाड़ी लड़की से अपने दिल की बात कहने में जरा भी देर नहीं की.
वह मेरा उस पहाड़ी लड़की को देखना जैसे इस कायनात का सबसे बेहतरीन लम्हा हो, -- "उस पहाड़ी लड़की के शर्म में भी एक जादू था. वे किसी शहर की फूल नही बल्कि उस दुनिया से अलग एक मासूम बनफूल थी".मै उससे जब भी बात करने की कोशिश करता तो वे अपने अंगूठे से मिट्टी खुरचने लगती थी. कहते हैं कि--"पहाड़ी लड़कियां अपने प्यार का इजहार ऐसे ही करती हैं" यानी मेरी ये पहाड़ी लड़की भी अपने अंदर के इस प्यार को अपने होठों से नहीं बल्कि अपने अंगूठे से व्यक्त कर रही थी.
बस प्रति दिन वे आती और धीरे से दूध वाले कटोरे को मुझे थमा तब तलक वे दरवाजे पर खड़ी रहती जब तलक कि मैं उसे उसका कटोरा लौटा नहीं देता था, कटोरे को लेकर चली जाती लेकिन उसका जाना मेरा इसके अगले दिन फिर इसी समय आने के इंतजार में लगा रहता. फिर एक दिन मैं उस पहाड़ी लड़की के घर उसके बापू और मां से उसका अपने लिए हाथ मांगने गया, तो उन्होंने कहा कि बेटे--"यह पहाड़ियां तमाम परदेसी और पहाड़ी लड़कियों की मोहब्बत के अनगिनत दास्तानो से भरी पड़ी है हम बहुत मासूम होते हैं बाबू हम दुनिया के धोखे नहीं जानते". अगर तुम्हें और बिटिया को कोई एतराज नहीं तो हमें क्या हम तैयार हैं.
पहाड़ी लड़की से विवाह करने की खुशी में जब मैं घर गया और मेरी नींद खुली तो मैं उठ बैठा तो देखा बगल में खड़े घर के सभी लोग कह रहे थे कि बेटे आराम से उठो ना जाने क्यों इतना सुन मेरा सर काफी भारी भारी लगने लगा. लेकिन जैसे ही थोड़ा आराम हुआ तो पता चला कि मैं दो वर्ष 4 महीने बाद उठ रहा हूं मेरा एक्सीडेंट हो गया था इतना सुनते ही मेरी पूरी दुनिया घूमती लगी.
और मैं फिर सामान्य होते ही फिर चल पड़ा-- "अपनी उस पहाड़ी लड़की से मिलने जिसे मैंने टूट कर और डूब कर चाहा था". मुझे रास्ते भर वही सायबान देवदार और उन पर बैठे परिंदों के जोड़े याद आते जा रहे थे. लेकिन जब मै पहाड़ो पे पहुंचा तो जैसे मेरे आने की आहट पे वे परिंदो के जोड़े जैसे चुप व खामोश हो गए हो. आज मुझे यह पहाड़ काफी सुना-सुना लग रहा था. मैं इसी उधेड़बुन में जब पहाड़ी लड़की के घर पहुंचा तो पता चला कि मेरी वे पहाड़ी लड़की मेरा इंतज़ार दिन-दिन रात-रात भर इन पहाड़ों पर पागलों की तरह करती रहती थी तुम्हारे ना आने पे वे रोती थी और अचानक एक दिन वे आवाज आनी भी बंद हो गई.
पहाड़ों के लोगों से पता चला कि मेरा नाम लेते लेते एक दिन वे पहाड़ी लड़की अचानक एक खाई में गिरी और हमेशा के लिए शांत हो गई. लेकिन नहीं वे पहाड़ी लड़की मेरी सांसो और धड़कनों में जिंदा है जिसे दुनिया या साहित्य जगत के लोग मेरी सबसे मशहूर किताब कह कर पुरस्कृत कर रहे हैं लेकिन वे नहीं जानते हैं कि जिस किताब का नाम हमने--"पहाड़ी लड़की" रखा है वह लड़की कोई और नहीं बल्कि यह वही पहाड़ी लड़की है.
यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P )
Mo. no. 7800824758
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