(ओढ़नी)
याद है बचपन---
मैं पहले कहाँ ओढ़ती थी ओढ़नी.
वे तो जब मैं तेरह की हुई,
तो अचानक-
"माँ" ने डाँटना शुरु किया,
और कहने लगी----
अब तुम अपने सीने पे
रंखा करो ओढ़नी।
मैं चौंकी--
कि ये अचानक "माँ" को क्या हुआ?
फिर लगा नही कुछ तो है,
यूँही नही माँ रखवाना चाहती होगी---
मेंरे सीने पे ओढ़नी.
फिर कमरे में बंद कर,
खुद को शीशे में टटोलने लगी,
तो अचानक कुछ शर्म सी आई,
कुछ बदला सा था,
जहाँ "माँ" ने कहा था-
मुझे रखने को ओढ़नी.
मै बाहर निकली---
तो देखा बचपन को खिसकते,
लगा "माँ " कितना सच कह रही थी,
कि तु सयानी हो रही है,
क्योंकि कुछ लोग तक रहे थे,
एै,रंग------
वही जहां "माँ "ने कहा था,
रख लो तुम ओढ़नी.
@@@रचयिता----रंगनाथ दूबे।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)
mo. no----7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
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