Thursday, 4 May 2023

(नागफनी सा हो गया हूँ)

गमले में सजी-------------
मै नागफनी सा हो गया हूँ.
आम, महुवे और निम्मौड़ी नीम की,
बंद कमरे की खिड़की से नही दिखते,
मेरे गाँव के पोखर,
ढ़ेरो आवाजें और शोर-शराबा
अंदर से मुझे कचोट रहा
ये कान भी तरस रहे सुनने को,
बागो में राग कोयल,
आज सबकुछ बदल गया है,
मै और मेरी जिंदगी दोनो,
अब बस केवल इतना है कि,
गमले मे सजी--------
मै नागफनी सा हो गया हूँ.
गरमी की उमस है,
और इतना बड़ा ये कंक्रीट का घर,
पर वे प्यास वे पानी,नही
जो मेरे कुँए के महज एक लोटे मे था,
उफ! शहर मे नमकीन और
मिठाई की ढ़ेरोंं दुकाने है,
लेकिन मन की मिठास कड़वी हो गई,
वे देशी गुड की डली,
छोड आया,
मै बस केवल इस कंक्रीट के घर मे,
गमले मे सजी--------
नागफनी सा हो गया हूँ.
चारो तरफ मशीनी खड़-खड़ाहट है,
रात है रौशनी है,
गाड़ियों की ढ़ेरों आवा-जाही है सड़क पे,
पर मेरी आँख खुली की खुली है,
याद आ रहा मुझे गाँव,
वे दरवाजे पे बिछी चारपाई,
वे पीपल के रात की सुंदरता मे ढेरों
चमकते जुगनू
हाय! ये पैसे की हत्तक ने छिन लिया,
आज मै जिंदा रह के भी,
केवल इस घर के,
गमले मे सजी ऐ "रंग" 
मै नागफनी सा हो गया हूँ.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

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