कभी हम-तुम तन्हा,
किनारे की टेबल पे ,घंटो बैठे
कैंटीन की चाय पीते थे.
वे दिन,वे कैंटीन, वे होठ
अब नही
बस यादो की टेबल पे,
खाली और ठंडा
काँच का गिलास रखा है,
जिसमें से कभी धुआं उठता था,
और उस धुएं को फुक,
हम-तुम किनारे की टेबल पे बैठ,
घंटो गुनगुनी चाय पीते थे.
@@@रंगनाथ द्विवेदी.
Mo.no.7800824758
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