Tuesday, 16 May 2023

(रेप के घाव)
थाने पे---------
एक गरीब की बिटिया,
अपनी सलवार उतारे,
जगह-जगह हुये-------
रेप के घाव दिखा रही है.
दारोगा------
बार-बार थप-थपा के देख रहा,
दाँत और नाखून चुभे,
उसके उरोजो को,
लड़की सिहर उठी-----
उसी रेप के छुवन सा,
एहसास हुआ उसे,
वे समझ गई,
आँख भर-भरा आई उसकी,
कि अब एक रात और
चिखेगी थाने पे,
फिर हरे हो जायेंगे ना भरने के लिये,
उसकी उरोजो पे ताजिंदगी,
ऐ "रंग" ------
ये रेप के घाव.

@@@रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

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