( मुनव्वर माँ हिन्दू या मुसलमान हुई )
तुमने "माँ" पे ढ़ेरो लिखा मुनव्वर,
लेकिन तुम मुक़म्मल-----
इस मिट्टी और मुल्क़ के हो नही पाये.
ये दरख़्त, ये जुगनू, ये पीपल
भी ना तुम्हें मुआफ करे मुनव्वर,
तुमने जो लिखा-------
उस अदब के भी हो नही पाये.
ये तुम्हारी जहालत है कि--
दोजख़ तेरी जुबान हुई,
बता ऐ मुनव्वर---
आखिर कब से तेरी "माँ "
हिन्दू या मुसलमान हुई.
यह रचना मेरी स्वरचित है.
रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जौनपुर.
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