(ठंड मे माँ)
ठंड मे माँ------------
जिस जगह गीला था वहां सोई थी।
ठंड-दर-ठंड--------
तु कितना बड़ा हो गया बेटे,
कि तु हफ्त़ो नही आता अपनी माँ के पास,
देख आज भी गीला है माँ का वे बिस्तर,
बस फर्क है इतना कि पहले तु भिगोता था,
अब इस लिये भीगा है-----------
कि माँ रात भर रोई थी।
एक सुबह माँ जगी नही-------
जब उसकी रजाई से ढके मुँह को खोला,
तो उसकी हमेशा के लिये मुँदी आँखे----
उस करवट हुये पड़ी थी,
जिस करवट कभी तुम सोते थे,
देखो और याद करो ये वही माँ का बुना स्वेटर है,
जिसे तुम कभी बचपन मे पहनते थे,
उसे वही बिछा जैसे दुनिया छोड़ने से पहले,
इस ठंड की रात तुम्हे ठंड से बचाने के लिये,
थपकी दे तुम्हे सुखे बिस्तर में सुला,
और खुद गीले बिस्तर मे सोई है।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
Thursday, 15 November 2018
ठंड मे माँ
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