Wednesday, 14 November 2018

अखबार लिखता था

(अखबार लिखता था)
वे कलम की रोशनाई से अपने,
एक आग लिखता था।
कल कत्ल हो गया उसका तिराहे पे,
जो अपने अखबार में इंकलाब लिखता था।
वे खुद को बेच न सका कभी,
सियासत के तवायफे महफ़िल मे,
वे मज़लूम की सिसकी को,
फकत आँसू नही तेजाब लिखता था।
अब तो ये लाश जलेगी बेशक,
इसमें सफेदपोश कातील भी सरिक होगा,
ये घड़ियाली आँसू सुख जायेंगे,
ऐ,रंग------कल फिर पैदा होगा
जो स्याह अँधेरे में जलायेगा चराग,
और सारी रात उकेरेगा सच का हौसला,
सुबह फिर लोग कहेंगे,
कि बहुत पहले हमारे शहर में-------
ऐसे ही एक शख्श़ अखबार लिखता था।

@@@पत्रकारिता दिवस पर।

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