(नट की बिटिया)
कचहरी के मजम़े मे नट की बिटिया,
एक पतले से रस्से पे नाचती है!
ये तमाशा है बेशक तमाशबीन लोगों,
उस पतले से रस्से पे जिसे देखते है,
उसी रस्से पे---------
उसकी बीमार माँ खाँसती है,
वे तुम्हारे या हमारे फेके सिक्के नहीं उठाती,
बल्कि शहर के पथराये दिल डाॅक्टरो,
के दवा की वे पर्चि है,
जिसे वे जितोड करतब दिखा के खरिदती है,
और अपनी बीमार माँ को बिस्किट और दवा दे,
फिर खुद और तीन बहनो की भूख मिटाने को,
वे अपने करतब वाले झोले से,
महज कभी एक तो कभी दो सूखि रोटियाँ निकाल,
तीनों बहनो को एक माँ सी बाटती है!
फिर हमेशा की तरह एक लंबी साँस ले,
सड़क के किनारे सरकारी खंभे से लगी,
बीमार और पीलि सी रौशनी मे,
वे सामने के स्कूल को एकटक ताकतीं है,
शायद न पढ़ पाने का दर्द क्या है ?वे जानती है,
एक हूक उठती है जिसे वे बहनो से छिपा,
टूटी चारपाई पे अपनी माँ के बगल,
जमीन पे फटी टाट और फटी फ्राक से बने
हुये रस्से जैसी चुभन लिये बिस्तर पे अपनी बहनो संग सोती है,
वाह री! इस नट के बिटिया की जिंदगी,
कि शहर अपने अय्याशियों मे डूबा है,
और एक मासूम नट की बिटिया,
कचहरी के तमाशे के बाद भी-------
जिंदगी के भयावह रस्से पे नाचती है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुुर
जौनपुर-----222002 (उत्तर--प्रदेश)।
mo.no.---7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।
No comments:
Post a Comment