Thursday, 15 November 2018

फागुन है

(फागुन है)
मदभरी गुनगुनी धुप मे फागुन है,
आम की अमराई,कोयल की कूक मे फागुन है।
ढ़लती उम्र में कोई पढ़ रहा दोहे,
कोई कह रहा गोरी!तुम्हारे रुप मे फागुन है।
प्रीत के,प्यार के हर कही बरस रहे रंग,
फिर भी किसी विरहन के हूक मे फागुन है।
कोई हथेली से मल रहा गुलाल,
तो कही किसी प्रेमी के चूक मे फागुन है।
ढ़ोल की थाप पर मेरा झुम रहा मन,
हाय!रंग--कितने शुरुर मे फागुन है।

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