(हिन्दी और उर्दू नही आती)
चिलचिलाती धूप मे-------------
माथे से पसीना टपकता है साहब,
हम गरीबो के बदन से कभी-------
परफ्यूम की खुशबू नही आती।
हम इमारते मंदिर--मस्जिद सब बनाते है,
हमारे छाले फूटते है,भरते है,फिर फूटते है
साहब! हम गरीबो को रोटी के लाले रहते है,
आपके कुत्ते तलक केक खाते है,
हमारे झोपड़े तलक एक दिन की भी खातिर----
कभी ये अय्यासी नही आती।
हम अखबार,गीता--कुरान,मजहब का क्या करे?
हम गरीबो को तुम्हारे जाती-मजहब और दंगे की----
ठीक से हिन्दी और उर्दू नही आती।
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758
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