Wednesday, 14 November 2018

रईश की इमारत मे दफ़न हूँ

(रईस की ईमारत में दफ़न हूँ )

मै शहर के——————-
सबसे रईस की इमारत में दफ्ऩ हूँ।
मेरा शौहर कितना चाहता है मुझको,
कि महीनो से बेवा किये है बिस्तर,
मै उसी बिस्तर में दफ्ऩ हूँ।
मै शहर के—————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
कालीन बिछे फर्श और इराने आईना,
वे अरब का चराग!
सब कुछ तो है लेकिन मै टूट गई झुमर सी,
बिखर के खत्म हूँ।
मै शहर के————
सबसे रईस की इमारत मे दफ्ऩ हूँ।
वे शीशमे दराज़ मै खोलती नही,
इतनी खामोश हो गई हु——–
की खुदी से बोलती नही!
वे देखो खिड़की के उस तरफ जैसे—–
अब भी खड़ा है मेरी चाहत का बेगुनाह,
मै बेवफ़ा थी उसकी,
ये आह है उसी की एै,रंग—–मै जो
शहर के सबसे रईस की इमारत में खत्म हूँ।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है।

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