(जवान हुई)
कैसे निखरते------------
किसी मजदूर बाप की बिटिया के अंग,
इसके पेट और नाभी का पिचकापन,
गर पढ़ सके तो पढ़,
अरे ये वो पगली है------------
जो आधे से ज्यादा फाकाकसी मे जवान हुई।
रातभर खाँसती माँ के सिरहाने बैठी रही,
दवा की खाली शीशी का दर्द पूछ इससे,
एक झपकी का इसके झोंका भी टूट गया------
ये एैसी ही गुजरी रातो मे जवान हुई।
बापु के काम से लौटने के पदचाप की पीड़ा,
का असह्यपन जानती है!
फिर भी मूक और मौन है,
अंदर ही अंदर बेटी को न व्याह पाने का सुलगापन क्या है?
ये जानती है!
तभी तो कभी सजी-सँवरी नही ना आईना देखा,
एै "रंग" ----------
ये एैसे ही अभागेपन मे जवान हुई।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर---222002 (उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758
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