Wednesday, 14 November 2018

मील का सायरन

( मील का सायरन)
मील का सायरन बजा है----------
शायद आज फिर किसी मील के मजदूर को,
घर पे भूखे बच्चो की रोटी,
और बीमार बीबी की दवा ने,
असमय ही इसे मार दिया है.
रोज लौटता था थका-मांदा,
फिर उसके लौटने के थोड़ी देर बाद,
घर से-----------
ईधन के जलने का धुआँ उठता था,
वे धुआँ ------------
जो उसकी बीमार बीबी के साँसो मे घुसते ही,
उसके न थमने वाली खाँसी मे बदल जाती.
आज न लौटेगा-----------
तकते--तकते जब इनकी आँखें थक जायेंगी,
तो इस मजदूरे की बीमार बीबी,
किसी बच्चे को भेजेगी,
अपने बापू का पता करने,
फिर कुछ मील के मजदूर मिलके उसकी लाश लायेंगें,
रोना-पीटना होगा कुलबुलाते खाली पेट.
फिर अल-सुबह रोज की तरह बजेगा----
मील का सायरन,
इन्हीं मे से कोई निकलेगा जाने के लिये,
क्योकि इनकी जिंदगी है एै "रंग"
यही मौत और बजता हुआ मील का सायरन.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला---जौनपुर पिन नं.  222002 ( उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.----7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है ।

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